कुल देवता/देवी-
कुल देवता/देवी- का चैतन्य ग्यान--
मनुष्य एक समाज-प्रिय प्राणी है । वह जब अपने-अपने परिवार के मंगल कल्याण के लिए साधना, ध्यान, प्रार्थना, पूजा, उपासना के क्षेत्र में प्रवेश करता है तो उस वक्त उसकी प्रार्थना उसके परिवार के कुल देवता/देवी की ओर से स्वीकार की जाती है । वास्तविक रूप से जिन परिवार को कुल देवता/देवी का आशीर्वाद, कृपा प्राप्त होती है उन परिवारों का मंगल कल्याण हो जाता है और उन्हें बिन विघ्न बाधा के सुख, समृद्घि, शांति प्राप्त होती है तथा पूर्व जन्म के पाप (प्रारब्ध) नष्ट होते हैं और आने वाली पीढी भी बिना विघ्न बाधाओं के सफलताओं की ओर अग्रसर होने लगती है । आप स्वयं खुद ही विचार मंथन करें कि, इस संसार में ऐसे कौन से धर्म हैं जो सप्ताह में एक दिन निश्चित् समय में अपने एक ईश्वर की प्रार्थना के बल पर हजारों वर्षों से सुखी, समृद्घशाली होकर विश्व में राज्य कर रहे हैं । वर्तमान में भी वे हमसे लगभग 200 वर्ष आगे हैं ।
कुल देवता/देवी---
संपूर्ण विश्व के प्रत्येक धर्म में यह सर्वमान्य सत्य मान्यता है कि इस समग्र विश्व (ब्रह्माण्ड) का रचियता, संचालक और स्वामी कोई न कोई अदृश्य शक्ति या पराशक्ति है और वही परम पिता परमेश्वर या सर्वोपरि है
प्राचीनकाल से प्रत्येक देश में अनगिनत देवता माने जाते हैं, प्रकृति के प्रत्येक कार्य का स्वामी या संचालक एक देवता होता है । इसी प्रकार प्रत्येक मानव के परिवार का कुल देवता/देवी होते हैं, किन्तु ज्यादातर लोगों को अपने कुल देवता/देवी की जानकारी न होने के कारण जीवन में कई प्रकार के अवरोधों का सामना करना पडता है
प्रत्येक परिवार को अपने कुल देवता/देवी की जानकारी अवश्य होनी चाहिए । अपने कुल देवता/देवी की प्रार्थना (मंत्रॊं सहित) प्रतिदिन निश्चित समय में अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि कुल देवता/देवी को हमारे परिवार के पूर्वज हजारों वर्षों से पूजते चले आ रहे हैं । उनकी सूक्ष्म शक्ति (ऊर्जा) ब्रह्माण्ड में पूर्व से ही स्थापित है, इसी सूक्ष्म शक्ति को प्रार्थना के माध्यम से हमें कई गुणा कर प्राप्त करना चाहिए । इस प्रकार कुल देवता/देवी का छत्र परिवार के सिर पर होने से हमें किसी प्रकार की चिंता नहीं रहती है । अतः सर्वमान्य तथ्य है कि हमें प्रतिदिन कुल देवता/देवी की प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए और उनकी सूक्ष्म धनात्मक ऊर्जा प्राप्त करना चाहिए, जिससे हम हमारे परिवार का मंगल कल्याण कर सके
कुल देवता एवं कुल देवी की प्रार्थना एवं पूजन विधि :
(समय प्रातः 7.00 बजे से 7.30 बजे तक)
सर्वप्रथम तीन यंत्र (ताम्र, चाँदी या सोना)
1. श्री गरुड-यंत्
2. श्री लक्ष्मीनारायण-यं
3. श्री नागपाश-यंत्
इन यंत्रॊं को इस क्रम से
(समय प्रातः 7.00 बजे से 7.30 बजे तक)
सर्वप्रथम तीन यंत्र (ताम्र, चाँदी या सोना)
1. श्री गरुड-यंत्
2. श्री लक्ष्मीनारायण-यं
3. श्री नागपाश-यंत्
इन यंत्रॊं को इस क्रम से
1. श्री गरुड-यंत्र 2. श्री लक्ष्मीनारायण-यंत्र 3. श्री नागपाश-यंत्र
इनके सामने एक नारियल (पूंछ अपनी तरफ), उस पर कपूर जलावें एवं जब तक नारियल में छेद ना हो जाये उसे चारों पलटते रहें (रोज नहीं बदलना)
निम्न मंत्रॊं का जाप कम से कम 1 बार करें और बोलें हमारे जो भी कुल देवता/देवी हैं, हमारे परिवार की ऋणात्मक ऊर्जा सदा के लिए नष्ट करते हुए धनात्मक ऊर्जा प्रदान करें
1. ओम चैतन्य कुलदेवतायै/कुलदेव्यै जागृत, जागृत, जागृ
2. ओम चैतन्य कुलपुरुषाय
3. ओम ऐं हरीम् श्रीं क्लीं हलीम् आं वं वासुदेवाय ते नमो नमः
द्वारा - गुरुतत्व शिवोम् तीर्थ जी ।
Courtesy Pt Ashu Bahuguna G.
इनके सामने एक नारियल (पूंछ अपनी तरफ), उस पर कपूर जलावें एवं जब तक नारियल में छेद ना हो जाये उसे चारों पलटते रहें (रोज नहीं बदलना)
निम्न मंत्रॊं का जाप कम से कम 1 बार करें और बोलें हमारे जो भी कुल देवता/देवी हैं, हमारे परिवार की ऋणात्मक ऊर्जा सदा के लिए नष्ट करते हुए धनात्मक ऊर्जा प्रदान करें
1. ओम चैतन्य कुलदेवतायै/कुलदेव्यै जागृत, जागृत, जागृ
2. ओम चैतन्य कुलपुरुषाय
3. ओम ऐं हरीम् श्रीं क्लीं हलीम् आं वं वासुदेवाय ते नमो नमः
द्वारा - गुरुतत्व शिवोम् तीर्थ जी ।
Courtesy Pt Ashu Bahuguna G.
इष्ट देव की उपासना/Deity worship
ग्रह-- इष्ट देव
प्रतिनिधि ग्रह-- इष्ट देव---- रत्न दान -----सामग्री
गुरु--------------- विष्णु-----पुखराज- ---पीली वस्तुएँ
शुक्र------------- देवी के रूप--- हीरा -----सफेद मिठाई
शनि------------- शिव जी----- नीलम ----काली वस्तुएँ
सूर्य--------- गायत्री, विष्णु---- माणिक--- सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध------------- गणेश-------- पन्ना-------- हरी वस्तु
मंगल ---------हनुमानजी ------मूँगा------- लाल वस्तुएँ
चंद्र------------- शिवजी-------- मोती------- सफेद वस्तु
गुरु--------------- विष्णु-----पुखराज- ---पीली वस्तुएँ
शुक्र------------- देवी के रूप--- हीरा -----सफेद मिठाई
शनि------------- शिव जी----- नीलम ----काली वस्तुएँ
सूर्य--------- गायत्री, विष्णु---- माणिक--- सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध------------- गणेश-------- पन्ना-------- हरी वस्तु
मंगल ---------हनुमानजी ------मूँगा------- लाल वस्तुएँ
चंद्र------------- शिवजी-------- मोती------- सफेद वस्तु
विशेष : राहु और केतु पर्वतों के खराब होने पर क्रमश:
सरस्वती और गणेश जी की आराधना करना लाभ देता है।
'ऊँ रां राहवे नम:' और 'ऊँ कें केतवे नम:' के जाप से भी ये ग्रह शांत होते हैं।
;लग्नानुसार करें इष्ट देव की उपासना—-
भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है। आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है – ‘एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय’ जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है।
इष्ट देवता का निर्धारण कुंडली में लग्न अर्थात प्रथम भाव को देखकर किया जाता है।
जैसे यदि प्रथम भाव में मेष राशि हो तो (1 अंक) तो लग्न मेष माना जाएगा।
लग्नानुसार इष्ट देव——
लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी वृषभ,
तुला शुक्र दुर्गा जी मिथुन, कन्या बुध गणेश जी, विष्णु
कर्क चंद्र शिव जी सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी धनु/ मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है।
इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।
देव मंत्र —- हनुमान—- ऊँ हं हनुमंताय नम: शिव—- ऊँ रुद्राय नम: गणेश —ऊँ गंगणपतयै नम: दुर्गा— ऊँ दुं दुर्गाय नम: राम —-ऊँ रां रामाय नम: विष्णु— विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ लक्ष्मी— लक्ष्मी चालीसा,…ऊँ श्रीं श्रीयै नम: विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें।
व्यक्ति यदि अपने लग्र के देवता की पूजा करें तो उनको अपने हर काम में सफलता मिलने लगेगी।
मेष लग्र- मेष लग्र में जन्म लेने वाले लोगों को रवि, मंगल, गुरु, ये ग्रह शुभ फल देते हैं। इसलिए इन लोगों को रवि और गणेश जी की आराधना करनी चाहिए।
वृषभ लग्र- इस लग्र वाले को शनि देव की उपासना करनी चाहिए।
मिथुन लग्र- लग्र पर जिनका जन्म होगा उनको शुक्र फल देता है। इसलिए वे कुल देवता की उपासना करें।
कर्क लग्र- कर्क लग्र वाले लोगों को गणेश जी और शंकर भगवान की उपासना करनी चाहिए।
सिंह लग्र- सिंह लग्र में वाले कुलदेवता का पूजन करें।
कन्या लग्र- कन्या लग्र वाले लोगों को शुक्र शुभफल देता है। इसलिए कुलदेवता की आराधना करें।
तुला लग्र- तुला लग्र वाले जातकों को ग्रहों की उपासना करनी चाहिए।
वृश्चिक लग्र- वृश्चिक लग्र वाले लोगों के लिए भी ग्रहों की पूजा शुभ फल देने वाली होती है।
धनु लग्र- इस लग्र पर जिनका जन्म होता है। उन्हे सूर्य और गणेश की आराधना करनी चाहिए।
मकर लग्र- मकर लग्र वाले जातकों को अपनी कुलदेवी और कुबेर की उपासना करनी चाहिए।
कुंभ लग्र- कुंभ लग्र वालों के लिए भी कुल देवी की ही आराधना शुभकारी होती है।
मीन लग्र- इस लग्र वाले शंकर और गणपति जी की भक्ति करें श्री गणेश : मात्र पत्तों से ही खुश होने वाले देवता गणेश जी ही ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा घास-फूस अपितु पेड़-पौधों की पत्तियों से भी करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। श्री विनायक को प्रसन्न करने के लिए इन पर मात्र पत्तों को भी अर्पित किया जा सकता है।
आपके इष्ट देव
शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।
जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।
-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
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लग्नानुसार करें इष्ट देव की उपासना
भारती पंडित
भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है।
आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है -
'एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय'
जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है। इष्ट देवता का निर्धारण कुंडली में लग्न अर्थात प्रथम भाव को देखकर किया जाता है। जैसे यदि प्रथम भाव में मेष राशि हो तो (1 अंक) तो लग्न मेष माना जाएगा।
लग्नानुसार इष्ट देव
लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव
मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी
वृषभ, तुला शुक्र दुर्गा जी
मिथुन, कन्या बुध गणेश जी, विष्णु
कर्क चंद्र शिव जी
सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी
धनु, मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी
लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।
देव मंत्र
हनुमान ऊँ हं हनुमंताय नम:
शिव ऊँ रुद्राय नम:
गणेश ऊँ गंगणपतयै नम:
दुर्गा ऊँ दुं दुर्गाय नम:
राम ऊँ रां रामाय नम:
विष्णु विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ
लक्ष्मी लक्ष्मी चालीसा
ऊँ श्रीं श्रीयै नम:
विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें
मेष लग्र- मेष लग्र में जन्म लेने वाले लोगों को रवि, मंगल, गुरु, ये ग्रह शुभ फल देते हैं। इसलिए इन लोगों को रवि और गणेश जी की आराधना करनी चाहिए।
वृषभ लग्र- इस लग्र वाले को शनि देव की उपासना करनी चाहिए।
मिथुन लग्र- लग्र पर जिनका जन्म होगा उनको शुक्र फल देता है। इसलिए वे कुल देवता की उपासना करें।
कर्क लग्र- कर्क लग्र वाले लोगों को गणेश जी और शंकर भगवान की उपासना करनी चाहिए।
सिंह लग्र- सिंह लग्र में वाले कुलदेवता का पूजन करें।
कन्या लग्र- कन्या लग्र वाले लोगों को शुक्र शुभफल देता है। इसलिए कुलदेवता की आराधना करें।
तुला लग्र- तुला लग्र वाले जातकों को ग्रहों की उपासना करनी चाहिए।
वृश्चिक लग्र- वृश्चिक लग्र वाले लोगों के लिए भी ग्रहों की पूजा शुभ फल देने वाली होती है।
धनु लग्र- इस लग्र पर जिनका जन्म होता है। उन्हे सूर्य और गणेश की आराधना करनी चाहिए।
मकर लग्र- मकर लग्र वाले जातकों को अपनी कुलदेवी और कुबेर की उपासना करनी चाहिए।
कुंभ लग्र- कुंभ लग्र वालों के लिए भी कुल देवी की ही आराधना शुभकारी होती है।
मीन लग्र- इस लग्र वाले शंकर और गणपति जी की भक्ति करें श्री गणेश : मात्र पत्तों से ही खुश होने वाले देवता गणेश जी ही ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा घास-फूस अपितु पेड़-पौधों की पत्तियों से भी करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। श्री विनायक को प्रसन्न करने के लिए इन पर मात्र पत्तों को भी अर्पित किया जा सकता है।
कुंडली से इष्ट देव जानने का सूत्र। किसी जातक की कुंडली से इष्ट देव जानने के अलग अलग सूत्र व सिद्धांत समय समय पर ऋषि मुनियों ने बताये व सम्पादित किये हैं।
जेमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जेमिनी इष्टदेव के निर्धारण में आत्मकारक ग्रह की भूमिका को सबसे अधिक मह्त्व्यपूर्ण बताया है।
कुंडली में लगना, लग्नेश, लग्न नक्षत्र के स्वामी एवं ग्रह जों सबसे अधिक अंश में हो चाहे किसी भी राशि में हो आत्मकारक ग्रह होता है।
इष्ट देव कैसे चुने?
अपना इष्ट देव चुनने में निम्न बातों का ध्यान देना चाहिए।
-आत्मकारक ग्रह के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व उनकी अराधना करनी चाहिए।
-अन्य मतानुसार पंचम भाव, पंचमेश व पंचम में स्थित बलि ग्रह या ग्रहों के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व अराधना करें।
-त्रिकोणेश में सर्वाधिक बलि ग्रह के अनुसार भी इष्टदेव का चयन कर सकते हैं और उसी अनुसार उनकी अराधना करें।
ग्रह अनुसार देवी देवता का ज्ञान
सूर्य-राम व विष्णु
चन्द्र-शिव, पार्वती, कृष्ण
मंगल-हनुमान, कार्तिकेय, स्कन्द, नरसिंग
बुध-गणेश, दुर्गा, भगवान् बुद्ध
वृहस्पति-विष्णु, ब्रह्मा, वामन
शुक्र-परशुराम, लक्ष्मी
शनि-भैरव, यम, कुर्म, हनुमान
राहु-सरस्वती, शेषनाग
केतु-गणेश व मत्स्य
इस प्रकार अपने इष्ट देव का चयन करने के उपरांत किसी भी जातक को उनकी पूजा अराधना करनी चाहिए तथा उसके बाद भी आपको धर्मीं कार्य, अनुष्ठान, जाप, दान आदि निरंतर करते रहना चाहिए। आप इन्हें किसी भी परिस्थिति में ना त्यागें। अपने इष्ट देव का निर्धारण कर यदि आप नियमित पूजा अराधना करते हैं तो आपको आपने पूर्वजन्म कृत पापों से मुक्ति मिलने में सहायता हो जाती है।
ibn7आपके इष्ट देव
शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।
जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।
-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
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लग्नानुसार करें इष्ट देव की उपासना
भारती पंडित
भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है।
आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है -
'एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय'
जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है। इष्ट देवता का निर्धारण कुंडली में लग्न अर्थात प्रथम भाव को देखकर किया जाता है। जैसे यदि प्रथम भाव में मेष राशि हो तो (1 अंक) तो लग्न मेष माना जाएगा।
लग्नानुसार इष्ट देव
लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव
मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी
वृषभ, तुला शुक्र दुर्गा जी
मिथुन, कन्या बुध गणेश जी, विष्णु
कर्क चंद्र शिव जी
सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी
धनु, मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी
लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।
देव मंत्र
हनुमान ऊँ हं हनुमंताय नम:
शिव ऊँ रुद्राय नम:
गणेश ऊँ गंगणपतयै नम:
दुर्गा ऊँ दुं दुर्गाय नम:
राम ऊँ रां रामाय नम:
विष्णु विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ
लक्ष्मी लक्ष्मी चालीसा
ऊँ श्रीं श्रीयै नम:
विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें
किसको ईष्ट बनाए & आपके इष्ट देव कौन हैं?
शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।
जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें। फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें। मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें। अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें। मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें। जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
रविवार- विष्णु सोमवार- शिवजी। मंगलवार- हनुमानजी बुधवार- गणेशजी गुरूवार- शिवजी शुक्रवार- देवी
शनिवार- भैरवजी।
राशि के आधार पर : पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें। वृष: गणेशजी। मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कर्क: हनुमानजी। सिंह: शिवजी। कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली। तुला: भैरव, हनुमानजी, काली। वृश्चिक: शिवजी धनु: हनुमानजी। मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कुंभ: GANESH JI मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।
जन्म कुंडली से : जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।
ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव।
सूर्य: विष्णु।चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।बुध- गणेश, विष्णु गुरू- शिव। शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती। शनि- भैरव, काली।
सोलह सोमवार व्रत
जब भी जाएं मंदिर, जरूर करना चाहिए ये एक काम
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उज्जैन। शास्त्रों के अनुसार भगवान के कई रूप बताए गए हैं और सभी देवी-देवताओं की पूजा की अलग-अलग विधियां हैं, अलग-अलग नियम हैं। पूजन पद्धितियों में भगवान की प्रतिमा या मंदिर की परिक्रमा का महत्वपूर्ण स्थान है।
हम जब भी किसी मंदिर जाते हैं तो वहां की परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए। परिक्रमा करने पर कई प्रकार के चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं। यहां जानिए परिक्रमा से जुड़ी खास बातें और किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए।
क्यों की जाती है परिक्रमा
परिक्रमा की जाती है क्योंकि देवमूर्ति के आसपास दिव्य ओरा मंडल होता है और इस ओरा मंडल से सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए हमें परिक्रमा करनी चाहिए। मंदिर में लगातार भगवान की पूजा और मंत्रों का उच्चारण होता रहता है, जिसका असर सदैव वहां के वातावरण में बना रहता है। शास्त्रों के अनुसार मंत्रों के उच्चारण मात्र से मन और वातावरण की शुद्धि होती है, पवित्रता बढ़ती है, ऊर्जा बढ़ती है, नकारात्मक शक्तियां निष्क्रीय हो जाती हैं। मंदिर के वातावरण से इन सब फायदों को ग्रहण करने के लिए परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।
हमेशा ध्यान रखें कि परिक्रमा सदैव दाएं हाथ की ओर से ही प्रारंभ करनी चाहिए, क्योंकि दैवीय शक्ति के आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है। बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मंडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्य परमाणुओं में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है। जबकि सीधे हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर वातावरण से ऊर्जा आसानी से प्राप्त होती है।
सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या अलग-अलग बताई गई है जैसे-
- श्री गणेश की तीन परिक्रमा ही करनी चाहिए। जिससे श्री गणेश भक्त को रिद्ध-सिद्धि सहित समृद्धि का वर देते हैं।
- शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। शिवजी बड़े दयालु हैं वे बहुत जल्द प्रसन्न हो जाते हैं और भक्त पर सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। भोलनाथ मात्र आधी परिक्रमा से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
- माताजी की एक परिक्रमा की जाती है। माता अपने भक्तों को शक्ति प्रदान करती है।
- भगवान नारायण अर्थात् विष्णु की चार परिक्रमा करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
- एक मात्र प्रत्यक्ष देवता सूर्य की सात परिक्रमा करने पर सारी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी हो जाती है।
- श्रीराम के परम भक्त पवनपुत्र श्री हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है। भक्तों को इनकी तीन परिक्रमा ही करना चाहिए।
ये भी ध्यान रखें...
परिक्रमा करते समय बीच-बीच में रुकना नहीं चाहिए।
परिक्रमा वहीं पूरी होती है जहां से परिक्रमा प्रारंभ की जाती है। अधूरी परिक्रमा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है।
यह ब्लॉ देवी-देवताओं की परिक्रमा
शास्त्रों के अनुसार पूजा के समय सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा करने की परंपरा है। सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या अलग-अलग बताई गई है जैसे-
- श्री गणेश की तीन परिक्रमा ही करनी चाहिए। जिससे श्री गणेश भक्त को रिद्ध-सिद्धि सहित समृद्धि का वर देते हैं।- शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। शिवजी बड़े दयालु हैं वे बहुत जल्द प्रसन्न हो जाते हैं और भक्त पर सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं।- माताजी की एक परिक्रमा की जाती है। माता अपने भक्तों को शक्ति प्रदान करती है।- भगवान नारायण अर्थात् विष्णु की चार परिक्रमा करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।- एक मात्र प्रत्यक्ष देवता सूर्य की सात परिक्रमा करने पर सारी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी हो जाती है।
सामान्यत: पूजा हम सभी करते हैं परंतु कुछ छोटी-छोटी बातें जिन्हें ध्यान रखना और उनका पालन करना अतिआवश्यक है। इन छोटी-छोटी बातें के पालन से भगवान जल्द ही प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। यह बातें इस प्रकार हैं-
- सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु- यह पंचदेव कहे गए हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में करनी चाहिए।- भगवान की केवल एक मूर्ति की पूजा नहीं करना चाहिए, अनेक मूर्तियों की पूजा से कल्याण की कामना जल्द पूर्ण होती है। - मूर्ति लकड़ी, पत्थर या धातु की स्थापित की जाना चाहिए।- गंगाजी में, शालिग्रामशिला में तथा शिवलिंग में सभी देवताओं का पूजन बिना आवाहन-विसर्जन किया जा सकता है।- घर में मूर्तियों की चल प्रतिष्ठा करनी चाहिए और मंदिर में अचल प्रतिष्ठा।- तुलसी का एक-एक पत्ता कभी नहीं तोड़ें, उसका अग्रभाग तोड़ें। मंजरी को भी पत्रों सहित तोड़ें।- देवताओं पर बासी फूल और जल कभी नहीं चढ़ाएं।- फूल चढ़ाते समय का पुष्प का मुख ऊपर की ओर रखना चाहिए।
16 संस्कारों में लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र
हिंदू धर्म में किए जाने वाले 16 संस्कार केवल कर्मकांड या रस्में नहीं हैं। इनमें जीवन प्रबंधन के कई सूत्र छुपे हैं। आज के भागदौड़ भरे जीवन में ये सूत्र हमें जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों विकास को आगे बढ़ाते हैं। हमें इन संस्कारों में खुद के वैवाहिक, विद्यार्थी और व्यवसायिक जीवन के सूत्र तो मिलते ही हैं साथ ही अपनी संतान को कैसे संस्कारवान बनाएं इसके तरीके भी मिलते हैं।
पुंसवन संस्कार : इस संस्कार के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह समझाया जाता है कि शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक दृष्टि से परिपक्व यानि पूर्ण समर्थ हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान उत्पन्न करें।
नामकरण संस्कार: बालक का नाम सिर्फ उसकी पहचान के लिए ही नहीं रखा जाता। मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर नामकरण संस्कार किया जाता है।
चूड़ाकर्म संस्कार: (मुण्डन, शिखा स्थापना) सामान्य अर्थ में, माता के गर्भ से सिर पर आए वालों को हटाकर खोपड़ी की सफाई करना आवश्यक होता है। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से नवजात शिशु के व्यवस्थित बौद्धिक विकास, कुविचारों के परिस्कार के लिये भी यह संस्कार बहुत आवश्यक है।
अन्नप्राशसन संस्कार: जब शिशु के दांत उगने लगें, तो मानना चाहिए कि प्रकृति ने उसे ठोस आहार, अन्नाहार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। स्थूल (अन्नमयकोष) के विकास के लिए तो अन्न के विज्ञान सम्मत उपयोग को ध्यान में रखकर शिशु के भोजन का निर्धारण किया जाता है। इन्हीं तमाम बातों को ध्यान में रखकर यह महत्वपूर्ण संस्कार संपन्न किया जाता है।
विद्यारंभ संस्कार: जब बालक/ बालिका की उम्र शिक्षा ग्रहण करने लायक हो जाय, तब उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है । इसमें समारोह के माध्यम से जहां एक ओर बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा किया जाता है, वहीं ज्ञान के मार्ग का साधक बनाकर अंत में आत्मज्ञान की और प्रेरित किया जाता है।
यज्ञोपवीत संस्कार : जब बालक/ बालिका का शारीरिक-मानसिक विकास इस योग्य हो जाए कि वह अपने विकास के लिए आत्मनिर्भर होकर संकल्प एवं प्रयास करने लगे, तब उसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक एवं सामाजिक अनुशासनों का पालन करने की जिम्मेदारी सोंपी जाती है।
विवाह संस्कार : सफल गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक सामथ्र्य आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। यह संस्कार जीवन का बहुत महत्वपूर्ण संस्कार है जो एक श्रेष्ठ समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।
वानप्रस्थ संस्कार : गृहस्थ की जिम्मेदारियां यथा शीघ्र संपन्न करके, उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व, पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देना ही इस संस्कार का उद्देश्य है।
अन्येष्टि संस्कार : मृत्यु जीवन का एक अटल सत्य है । इसे जरा-जीर्ण को नवीन-स्फूर्तिवान जीवन में रूपान्तरित करने वाला महान देवता भी कह सकते हैं ।
मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार): मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार) जीवन का एक अबाध प्रवाह है । शरीर की समाप्ति के बाद भी जीवन की यात्रा रुकती नहीं है । आगे का क्रम भी अच्छी तरह सही दिशा में चलता रहे, इस हेतु मरणोत्तर संस्कार किया जाता है।
जन्म दिवस संस्कार : मनुष्य को अन्यान्य प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है । जन्मदिन वह पावन पर्व है, जिस दिन ईश्वर ने हमें श्रेष्ठतम मनुष्य जीवन में भेजा। श्रेष्ठ जीवन प्रदान करने के लिये ईश्वर का धन्यवाद एवं जीवन का सदुपयोग करने का संकल्प ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है।
विवाह दिवस संस्कार : जैसे जीवन का प्रांरभ जन्म से होता है, वैसे ही परिवार का प्रारंभ विवाह से होता है। श्रेष्ठ परिवार और उस माध्यम से श्रेष्ठ समाज बनाने का शुभ प्रयोग विवाह संस्कार से प्रारंभ होता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
जब-जब पृथ्वी पर सत्तामद में चूर अहंकारी अधर्मी असुरों की वृद्धि होती है, जब-जब अपने को अजर-अमर समझकर सत्तासीन क्रूरता नीति का सर्वथा त्याग कर देती है, जब-जब धर्म की हानि होती है और समूची धरती इनके अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर उठती है, तब-तब पृथ्वी पर सज्जनों की पीड़ा हरने के लिए बिबिध मनुज-शरीरों में कृपानिधि भगवान ने अवतार लिया है—
जब जब होहिं धरम के हानी।बाढैं असुर अधम अभिमानी।।
करहीं अनीति जाई नहिं बरनी।सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।
इसी श्रृंखला में श्वेतवाराह कल्प में वैवश्वत मन्वन्तर के अट्ठाइसवें द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में पृथ्वी का संकट हरने के लिए मथुरा में माता देवकी के गर्भ से भगवान कृष्ण ने अवतार लिया--एक ऐसा अवतार जिसने विश्व को अपने कर्तव्य के प्रति सचेत होने, युगानुकूलधर्माचरण में प्रवृत्त करने तथा वंश-परिवारवाद से ऊपर उठकर समष्टिहित में अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़े होने का गीतारुपी विगुल फूँका तथा जिसके स्मरण मात्र से दैहिक-दैविक-भौतिक त्रिविध संताप नष्ट हो जाते हैं।
मनीषा ने साधना के लिए चार रात्रियों का विशेष माहात्म्य बताया है- कालरात्रि (दीपावली), महारात्रि (दुर्गाष्टमी), मोहरात्रि (श्रीकृष्णजन्माष्टमी) और शिवरात्रि। जन्माष्टमी का व्रत ‘व्रतराज’ कहा गया है। जिनके जन्म के संयोग मात्र से बंदी गृह के सभी बंधन स्वत: ही खुल गए, सभी पहरेदार घोर निद्रा में चले गए, माँ यमुना जिनके चरण स्पर्श कर धन्य-धन्य हो गईं- उन भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण सृष्टि को मोह लेने वाला अवतार माना गया है। इसी कारण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है।इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान करते, नाम-कीर्तन करते अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है, प्राणियों के सब क्लेश दूर हो जाते हैं, दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है और इस लोक में सुख भोग कर मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परमलोक को प्राप्त करता है।
मनीषा ने साधना के लिए चार रात्रियों का विशेष माहात्म्य बताया है- कालरात्रि (दीपावली), महारात्रि (दुर्गाष्टमी), मोहरात्रि (श्रीकृष्णजन्माष्टमी) और शिवरात्रि। जन्माष्टमी का व्रत ‘व्रतराज’ कहा गया है। जिनके जन्म के संयोग मात्र से बंदी गृह के सभी बंधन स्वत: ही खुल गए, सभी पहरेदार घोर निद्रा में चले गए, माँ यमुना जिनके चरण स्पर्श कर धन्य-धन्य हो गईं- उन भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण सृष्टि को मोह लेने वाला अवतार माना गया है। इसी कारण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है।इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान करते, नाम-कीर्तन करते अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है, प्राणियों के सब क्लेश दूर हो जाते हैं, दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है और इस लोक में सुख भोग कर मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से छूटकर परमलोक को प्राप्त करता है।
इस वर्ष श्रीकृष्णाष्टमी का व्रत 28अगस्त (बुधवार) को है तथा श्रीकृष्णजन्मोत्सव का पावन समय रात्रि 11.36 पर है। सुखद संयोग है कि इस वर्ष तिथि के साथ ही भगवान का प्रिय नक्षत्र रोहिणी भी जन्मसमय पर उदित है। व्रत का पारण 29 अगस्त (बृहस्पतिवार) को सूर्योदय के पश्चात प्रथम प्रहर में अपेक्षित है।
पुराणों के अनुसार जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सव किया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराज के अनुष्ठान से सभी को प्रेय और श्रेय दोनों की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला भगवत्कृपा का भागी बनकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अन्त में वैकुंठ जाता है। कृष्णाष्टमी का व्रत करने वाले के सब क्लेश दूर हो जाते हैं, दुख-दरिद्रता का नाश होता है। जीवनसाथी, संतान, आरोग्य, आजीविका आदि सहज सुलभ हो जाते हैं।
व्रत-विधि---- इस व्रत को करने वाले व्रत के एक दिन पूर्व हल्का-सात्विक भोजन करें तथा पूजन-स्थान की सफाई कर लें। उपवास वाले दिन सूर्योदय से पहले उठकर, स्नान आदि नित्यक्रिया से निवृत होकर पूजन-स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठें। घी का दीपक या धूपबत्ती या दोनों जलाकर गणेश-अम्बिका, पार्वती-शंकर, इष्टदेवता, कुलदेवता, ग्रामदेवता, स्थानदेवता और लोकपालों का ध्यान कर हथेली पर जल, अक्षत, सुपारी, फूल और द्रव्य रखकर मन में अपनी कामना-पूर्ति की इच्छा के साथ उपवास सहित व्रत का संकल्प करें-
संकल्प--- मम अखिल पाप प्रशमनपूर्वकं सर्वाभीष्ट सिद्धये श्रीकृष्णाष्टमी व्रतोपवासं अहं करिष्ये।
संकल्पित होकर संयमपूर्वक मन, वाणी और शरीर से पवित्र रहकर व्रत का पालन करें। उपवास के दिन झूठ बोलने, जुआ खेलने, सज्जनों-स्त्रियों का अपमान करने तथा अपशब्द बोलने से बचें। व्रत के दिन बार-बार जल पीने से, एक ही बार पान-तम्बाकु के उपभोग से, दिन में सोने से तथा मैथुन से व्रत भंग हो जाता है।
‘असकृज्जलपानाच्च सकृत्ताम्बूलचर्वणात्।
उपवासः प्रणश्येत दिवास्वापाच्च मैथुनात्।।’
ध्यान रहे कि विवशता में उपवास का कोई मतलब नहीं है। यदि पूर्ण निराहार नहीं कर सकें तो फलाहार, दुग्धपान कर सकते हैं किन्तु फलाहार के नाम पर चाट-पकौड़े, पकौड़ी, आलू की टिक्की आदि का सेवन बिल्कुल ही ना करें। इन्द्रियों पर संयम ना हो तो व्रत कदापि न करें। माता देवकी सहित वासुदेव श्रीकृष्ण का ध्यान करते, नाम-कीर्तन करते अथवा मंत्र जपते हुए रात्रि जागरण करें। यदि पूरी रात नहीं जग सकें तो भगवान् के जन्मकाल के समय पूजन-आरती तक अवश्य जगें।
पूजन-विधि—
सूर्यास्त के बाद स्नानादि से निवृत होकर पूजा-स्थान पर सपरिवार बैठकर भगवान का गर्भवास स्थिर लग्न में शाम 7:40 के पहले कर लें। इसके लिये काँसे के कटोरे में दूध डालकर उसमें लड्डूगोपाल की प्रतिमा अथवा शालिग्राम रखें तथा ढक दें। अखण्ड दीप जलाकर पूजन-थाली सजा लें—
सामग्री—
कलश, काँसे की थाली, गंगाजल, अक्षत, सुपारी, पान के पत्ते, चन्दन, रोली, सिन्दूर, धूप, दीपक, कपूर, रूई की बत्ती, माचिस, मौली, एक साफ रुमाल, भगवान के कपड़े, मुकुट, मोरपंख, बाँसुरी, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर), फल (ऋतुफल तथा खीरा) फूल, तुलसीदल, कुशा, आम के पत्ते तथा नजर उतारने के लिये अजवाइन और मिट्टी का कसोरा रख लें।
सविधि कलश स्थापित कर लें।
अब प्रसाद तैयार करें—
प्रसूता को दी जानेवाली हल्दी तथा अछवाइन (सूखे मेवों का पाक), भूने धनिया और शक्कर का चूर्ण, साबूदाने की खीर, सिंघाड़े का हलवा, माखन,
इसके बाद अपनी श्रद्धा से पुरुष सूक्त, श्री गजेन्द्र-मोक्ष (विपत्तिनाश के लिये), श्री विष्णु-सहस्रनाम आदिसे भगवान् की स्तुति करें और सामर्थ्य भर निम्नलिखित किसी एक मन्त्र का जप-कीर्तन करें।
“ॐ नमो नारायणाय ”
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
“कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः।।”
प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः।।”
“श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव”
“वसुदेवसुतंदेवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगदगुरुं”
संतान प्राप्ति के लिये संतानगोपाल मन्त्र का जप करें—
‘देवकी सुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं ब्रजे।।’
जप के लिये तुलसी, स्फटिक अथवा कमलगट्टे की माला लेनी चाहिये। माला न हो तो हाथ पर ही जप करें। रुद्राक्ष की माला प्रयोग में कदापि न लाएँ।
जन्मकाल के ठीक पहले श्रीमन्महागणाधिपतये नमः, देवक्यै नमः, वसुदेवाय नमः, बलभद्राय नमः, सुभद्रायै नमः, यशोदायै नमः, नन्दायै नमः का उच्चारण करें तथा हाथ में फूल-अक्षत लेकर माता देवकी की पूजा करें—
‘प्रणमे देव-जननी त्वया जातस्तुवामनः’
“गायद्भिः किन्नराद्यैः सतत परिवृता वेणुवीणानिनादैः
भृङ्गारादर्शकुम्भप्रवरयुतकरैः सेव्यमाना मुनीन्द्रैः
पर्यङ्के राजमाना प्रमुदितवदना पुत्रिणी सम्यगास्ते
सा देवी-देवमाता जयति सुरमुखा देवकी कान्तरूपा”
जन्म-समय पर श्री रामचरितमानस के राम-जन्म के छन्द काँसे की थाली और ताली की थाप तथा जयघोष के साथ पढ़ें—
‘भये प्रगट कृपाला, दीन दयाला, कौसल्या हितकारी.....’
भगवान् को दूध से निकलकर स्नान, पंचामृत स्नान, स्वच्छ जल से पुनः स्नान करायें तथा रुमाल से पोंछकर वस्त्रादि से सज्जित करें। मिट्टी के कसोरे में कपूर जलाकर अजवायन से भगवान् की नजर उतारें। अब उनका सविधि उपचारों से पूजन करें और भोग अर्पित करें। अन्त में आरती उतारें, प्रार्थना करें और पुष्पाञ्जली दें।
व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद माता के साथ बालकृष्ण की पूजा-अर्चना करें। सत्पात्रों को यथाशक्ति दान देकर पारण करें।
सम्पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से किया गया यह व्रत सभी अभीष्ट देनेवाला हो- इसी के साथ सबको श्रीकृष्णाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। मैंने अपनी रूची के अनुसार बनाया है इसमें जो भी सामग्री दी जा रही है वह मेरी अपनी नहीं है कहीं न कहीं से ली गई है। अगर किसी के कॉपी राइट का उल्लघन होता है तो मुझे क्षमा करें।मैं हर इंसान के लिए ज्योतिष के ज्ञान के प्रसार के बारे में सोच कर इस ब्लॉग को बनाए रख रहा हूँ।



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